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हिंदी साहित्य का आरम्भ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। यह वह समय है जब सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे-छोटे शासन केंद्र स्थापित हो गए थे जो परस्पर संघर्षरत रहा करते थे। विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी। हिन्दी साहित्य के विकास को आलोचक सुविधा के लिये पाँच ऐतिहासिक चरणों में विभाजित कर देखते हैं, जो क्रमवार निम्नलिखित हैं:- 1. आदिकाल (१३७५ विक्रम संवत से पहले) 2. भक्ति काल (१३७५-१७०० विक्रमी) 3. रीति काल (१७००-१९०० विक्रमी) 4. आधुनिक काल (१८५० ईस्वी के पश्चात) 5. नव्योत्तर काल (१९८० ईस्वी के पश्चात)
16 वीं शताब्दी के अंत और 18 वीं शताब्दी के प्रारंभ में ब्रिटिश साम्राज्य के विकास के साथ अंग्रेजी भाषा पूरी दुनिया में फैल गई। अपनी ऊंचाई पर, यह इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य था। 1913 तक, ब्रिटिश साम्राज्य ने 412 मिलियन से अधिक लोगों को अपने कब्जे में ले लिया, उस समय दुनिया की आबादी का 23%, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के दौरान इन कॉलोनियों और यूएसए ने अंग्रेजी में अपनी महत्वपूर्ण साहित्यिक परंपराओं का उत्पादन करना शुरू कर दिया। और पिछले सौ से अधिक वर्षों में ग्रेट ब्रिटेन, आयरलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका के कई लेखकों और अन्य पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों के सदस्यों को अंग्रेजी भाषा में काम करने के लिए नोबेल पुरस्कार मिला है।
भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को भी सम्मिलित किया गया है। यह उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से संस्कृत में समाचार प्रसारित किए जाते हैं। कतिपय वर्षों से डी. डी. न्यूज (DD News) द्वारा वार्तावली नामक अर्धहोरावधि का संस्कृत-कार्यक्रम भी प्रसारित किया जा रहा है, जो हिन्दी चलचित्र गीतों के संस्कृतानुवाद, सरल-संस्कृत-शिक्षण, संस्कृत-वार्ता और महापुरुषों की संस्कृत जीवनवृत्तियों, सुभाषित-रत्नों आदि के कारण अनुदिन लोकप्रियता को प्राप्त हो रहा है।
समाजशास्त्र, पद्धति और विषय वस्तु, दोनों के मामले में एक विस्तृत विषय है। परम्परागत रूप से इसकी केन्द्रियता सामाजिक स्तर-विन्यास (या "वर्ग"), सामाजिक संबंध, सामाजिक संपर्क, धर्म, संस्कृति और विचलन पर रही है, तथा इसके दृष्टिकोण में गुणात्मक और मात्रात्मक शोध तकनीक, दोनों का समावेश है। चूंकि अधिकांशतः मनुष्य जो कुछ भी करता है वह सामाजिक संरचना या सामाजिक गतिविधि की श्रेणी के अर्न्तगत सटीक बैठता है, समाजशास्त्र ने अपना ध्यान धीरे-धीरे अन्य विषयों जैसे- चिकित्सा, सैन्य और दंड संगठन, जन-संपर्क और यहां तक कि वैज्ञानिक ज्ञान के निर्माण में सामाजिक गतिविधियों की भूमिका पर केन्द्रित किया है। सामाजिक वैज्ञानिक पद्धतियों की सीमा का भी व्यापक रूप से विस्तार हुआ है। 20वीं शताब्दी के मध्य के भाषाई और सांस्कृतिक परिवर्तनों ने तेज़ी से सामाज के अध्ययन में भाष्य विषयक और व्याख्यात्मक दृष्टिकोण को उत्पन्न किया। इसके विपरीत, हाल के दशकों ने नये गणितीय रूप से कठोर पद्धतियों का उदय देखा है, जैसे सामाजिक नेटवर्क विश्लेषण।
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, गृह विज्ञान का संबंध गृह यानी कि 'घर' से है । आम तौर पर लोग समझते हैं कि गृह विज्ञान घर की देखभाल और घरेलू सामान की साज-संभाल का विषय है। लेकिन उनका ऐसा समझना केवल आंशिक रूप से सत्य है। गृह विज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत और विविधता भरा है। इसका दायरा ‘घर’ की सीमा से कहीं आगे तक निकल जाता है, और यह केवल खाना पकाने, कपडे़ धोने-संभालने, सिलाई-कढ़ाई करने या घर की सजावट आदि तक सीमित नहीं रह जाता। वास्तव में केवल यही एक ऐसा विषय है जो युवा विद्यार्थियों को उनके जीवन के दो महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों के लिए तैयार करता है - घर तथा परिवार की देखभाल और अपने जीवन में कैरिअर अथवा पेशे के लिए तैयारी। आजकल महिला तथा पुरुष दोनों ही घर तथा परिवार की जिम्मेदारियां समान रूप से निभाते हैं तथा अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग की तैयारी में भी बराबर की सहभागिता निभाते हैं।